स्त्री
स्त्री शब्द का अर्थ महिला, नारी, औरत या मादा होता है, जो मानवता का स्त्री स्वरुप है | इसे सृजन करने वाली या गर्भ धारण करने वाली या लज्जाशीलता का प्रतीक माना जाता है | पूर्व में ऐसा कहा जाता था कि -नारी तेरी यही कहानी आँचल में दूध और आँख में पानी परन्तु बदलते परिवेश में स्त्री के स्वरूपों में कई परिवर्तन आये, चार दीवारों में रहनेवाली, घूंघट के भीतर सिमट कर रहनेवाली तथा घर-परिवार को चलने के लिए कड़ी मेहनत करनेवाली स्त्रीयो की परिस्तिथियो में अनगिनत ठोस बदलाव आये | पूर्व समय मे कई आक्रांताओं के आक्रमण होने के कारण स्त्री को छुपाकर परदे में रखा जाता था क्योकि की स्त्री को भी सम्पति समझा जाता था इसलिए वह घूंघट में रही | परन्तु कई शताब्दियों के संघर्षों के बाद स्त्री ने अपने अस्तित्व को जग के सामने उजागर किया, अपनी कुशाग्र बुद्धिबल से और अथक परिश्रम से अपनी क्षमता को प्रखर निखारा है |
पश्चिम देशों में महिला स्वतंत्रता की शुरुआत १९०९-१९११ में औधोगिक देशों में हुई थी | इसकी औपचारिक शुरुआत जर्मन नेता क्लारा जेटकिन (उनका जन्म ५ जुलाई १८५७ जर्मनी के सैक्सनी के विडेराऊ गांव में हुआ था | वह एक प्रमुख जर्मन मार्र्कस्वादि सिद्धांतकार , कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और महिला अधिकारों की पक्षधर थीं |
८मार्च १९१७ को महिलादिवस की ऐतिहासिक नीव रूस की महिलाओं ने १९१७ में रोटी और अमन के लिए की गयी हड़ताल के माध्यम से रखी | इससे पूर्व पश्चिम में भी महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था और उन्हें कई मूलभूत अधिकारो से वंचित रखा था |
इसके ठीक विपरीत हमारे देश में महिलाओं के हितों के लिए लिए सर्वप्रथम पुरुषों ने आवाज उठाई थी | राजाराम मोहन राय ने भारतीय महिलाओं के अधिकारो की रक्षा और सतीप्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने के लिया १८१८ से अभियान आरम्भ किया था | उन्होंने अपने विचारों को ‘संवाद कौमुदी ‘ नमक पत्रिका के माध्यम से प्रचारित किया उसके बाद १८२९ में गवर्नर जर्नल लॉर्ड विलियम बैंटिंग की मदत से इस सतीप्रथा को प्रतिबंधित करनेवाला कानून पारित किया गया| उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा विवाह और महिलाओं के लिए सम्पति के अधिकारों के लिए संघर्ष किये थे |
इस प्रकार भारतीय महिलाएं पश्चिम की महिलाओं से कई गुना भाग्यशाली है क्युकी उनके अधिकारों के लिए आवाज भारतीय महापुरुषों ने बुलंद की थी | उनके जीवन में घटित एक घटना -राजाराम मोहनराय के बड़े भाई जगमोहन राय की मृत्यु आकस्मिक कारणों से हो जाती है १८११-१८१२ के आस-पास, उस समय उनकी भाभी अलकामंजरी की आयु केवल १७ वर्ष थी परन्तु उन्हें पति की चिता में जीवित जल जाना पड़ा था इससे राजाराममोहनराय बहुत ही व्यथित हो गए, यही घटना सतीप्रथा निर्मूलन की प्रमुख कारण बनी थी| १८२८ में ब्रह्मसमाज की स्थापना हुई और १८२९ में सतीप्रथा निर्मूलन पर कानून बन गया|