भारतीय काव्य परम्परा में प्रथम महर्षि वाल्मीकि, द्वितीय स्थान तुलसीदास जी को प्राप्त है और महाकवि कलिदासजी का स्थान तीसरा है । क्योंकी उनकी रचनाये खासकर अभिज्ञानशांकुतलम, रघुवंश और मेघदूत संस्कृत साहित्य को सर्वोच्च शिखर पर ले गयी थी । कालिदास जी की रचनाओं ने भारतीय साहित्य में एक अमूल्य योगदान दिया है । उनकी भाषा शैली और विषयवस्तु आज भी अध्ययन का केंद्र है।कवी कालिदास जी का असली नाम कृष्णबोध था परन्तु नाम को लेकर अलग अलग मान्यताये है। उनका वास्तविक नाम इतिहास में पूर्णतया अपष्ट है । उनको सर्वाधिक प्रसिद्धि कवी कालिदास के नाम से मिली है ।कालिदास जी का स्थान भारतीय साहित्य में बहुत ही ऊँचा है । उन्हे संस्कृत के सबसे महान कवियों और नाटककारों में गिना जाता है । उनका साहित्य सिर्फ प्रकृति और सौंदर्य का ही नहीं बल्कि मानव जीवन के आदर्श और दर्शन का भी अध्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है उनके नाटक और महाकाव्य आज भी भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है ।कालिदास जी की रचनाओं को आज भी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है भारतीय नाटक और काव्य पर उनका गहरा प्रभाव है | उन्हे भारत का ‘सेक्शपियर ‘ कहा जाता है ।उनकी रचनाओं का अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुआ है कालिदास जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है ।
नाटक
अभिज्ञान शाकुंतलम -राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रेम व उनके प्रेम विवाह की कथा है ।
विक्रमोशियम -राजा पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेम कहानी है ।
मालविकाग्निमित्रम -विदिशा के राजा अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कथा है । कालिदास जी का यह पहला नाटक मन जाता है ।
महाकाव्य
रघुवंश -इसमें भगवन राम सहित रघुकुल के कई राजाओं के जीवन का वर्णन है ।
कुमारसंभवम-इसमें शिव पार्वति के विवाह और कार्तिकेय के जन्म की कथा का वर्णन है ।
खण्डकाव्य
मेघदूतम -इसमें एक यक्ष द्वारा अपनी प्रेमिका यक्षिणी के पास बदल के माद्यम से सन्देश भेजने की मार्मिक कथा है ।
ऋतुसंहारम-इसमें वर्ष की सभी छह ऋतुओं और प्रकृति के सोंदर्य का मनमोहक वर्णन है ।